पश्चिमी चंपारण। दीपावली का नाम आते ही घर-आंगन में जगमगाते दीपक, रंगोली और खुशियों की तस्वीर सामने आने लगती है। कभी दीपावली की असली पहचान मिट्टी के दीयों की कतारें हुआ करती थीं, लेकिन बदलते समय के साथ त्योहार की रोशनी का स्वरूप भी बदल गया है। बिजली की रंग-बिरंगी झालरों, एलईडी लाइटों और कृत्रिम सजावटी सामानों की चकाचौंध में मिट्टी के दीयों की चमक फीकी पड़ती जा रही है। इसका सीधा असर पीढ़ियों से पुश्तैनी कारोबार संभाल रहे कुम्हार परिवारों की आजीविका पर पड़ रहा है। एक समय था, जब दीपावली से कई दिन पहले ही मिट्टी के दीयों की खरीदारी शुरू हो जाती थी। घरों के मुख्य द्वार, तुलसी चौरा, आंगन और छत पर मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा थी। अब आधुनिक सजावट के बढ़ते चलन ने इस परंपरा को काफी पीछे धकेल दिया है। लोग बिजली से चलने वाली झालरों और आकर्षक कृत्रिम दीपकों को अधिक पसंद कर रहे हैं। स्थानीय कुम्हार जयप्रकाश पडित, भवन पडित, रामचंद्र पडित, रामेश्वर पडित, गणेश पडित, पारस पडित, राजेंद्र पडित, राकेश पडित, बृजेश पडित, राजी पडित, राजन पडित और प्रभु पडित बताते हैं कि उनके हाथों से तैयार दीये बगहा अनुमंडल के अलावा उत्तर प्रदेश के कई इलाकों तक पहुंचते हैं। इस वर्ष मिट्टी के दीयों की कीमत करीब 100 रुपये सैकड़ा रखी गई है। इसके बावजूद बिक्री में पहले जैसी तेजी नहीं है। कुम्हारों के अनुसार, मिट्टी जुटाने से लेकर उसे गूंथने, चाक पर दीये बनाने, सुखाने और भट्ठी में पकाने तक काफी मेहनत और खर्च करना पड़ता है। लेकिन बाजार में उचित कीमत नहीं मिलती। मिट्टी के घड़े, सुराही और कुल्हड़ की मांग भी लगातार घट रही है। कारीगरों का कहना है कि सरकार की ओर से पर्याप्त मिट्टी, आधुनिक उपकरण, भट्ठी और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए तो इस पारंपरिक कला को बचाया जा सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस दीपावली मिट्टी के दीये खरीदकर स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित करें। उनका कहना है कि दीपावली की असली रोशनी केवल बिजली की झालरों में नहीं, बल्कि मिट्टी के उस दीपक में भी है, जो हमारी संस्कृति, परंपरा और हजारों परिवारों की रोजी-रोटी से जुड़ा है।