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104 वर्षीय लखन लाल को 43 साल बाद मिली आजादी, न्यायपालिका पर उठे सवाल#crime
Ashok Pawar MD
(DELHI, NEW DELHI)
104 वर्षीय लखन लाल को 43 साल बाद मिली आजादी, न्यायपालिका पर उठे सवाल#crime
दिल्ली - नए शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी का पहला बयान
ये North East दिल्ली का पहला गैंगस्टर हाजी अफ़ज़ाल है।
दिल्ली- प्रहलाद जोशी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के अतिरिक्त प्रभार की
धर्मेंद्र प्रधान के स्थिपे के बाद अभिजीत दिपके का fबयान झुकती है दुनिया झुकानेवाला चाहिये
धर्मेंद्र प्रधान इनके इस्तेपेके के बाद राहुल गांधी का बयान
उत्तराखंड पोलीस का जवान स्तीपादेकर आंदोलन मे शामिल
Delhi Police Sub Inspector नौकरी छोड़ पहुंचा
Delhi Police Sub Inspector नौकरी छोड़ पहुंचा
संसद परिसर में भाजपा सांसदों और विपक्षी सांसदों के बीच नारेबाज़ी के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वहीं रुकीं और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए नारे लगाए। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग की। वहीं, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी सदन की ओर रवाना हो गए।
नई दिल्ली - बीती रात प्रदर्शन के दौरान हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं।
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Ashok Pawar MD
03 Jun, 2025104-year-old Lakhan Lal got freedom after 43 years, questions raised on judiciary 104 वर्षीय लखन लाल, जिन्होंने ज़िंदगी के 43 साल एक अपराध के लिए जेल में बिताए जो उन्होंने कभी किया ही नहीं, अब अंततः निर्दोष घोषित कर दिए गए हैं। यह चौंकाने वाला मामला न केवल भारत की न्याय प्रणाली की धीमी प्रक्रिया को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि क्या वही न्यायपालिका, जो राष्ट्रपति के निर्णयों पर समयसीमा तय करती है, एक आम नागरिक को न्याय देने में इतने दशकों तक क्यों चूक गई? पूर्व जम्मू-कश्मीर पुलिस महानिदेशक शेष पाल वैद ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "एक 104 साल का व्यक्ति जिसने अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती 43 साल जेल में बिता दिए, आज़ाद तो हो गया लेकिन उस अन्याय का क्या? क्या कोई उसकी खोई हुई ज़िंदगी लौटा सकता है?" लखन लाल के मामले में यह स्पष्ट नहीं कि देरी का असली दोषी कौन है – पुलिस, अभियोजन पक्ष, या अदालतें। लेकिन इस मामले ने पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वैद ने आगे कहा, "जिस न्यायपालिका को राष्ट्रपति के निर्णयों की समयसीमा तय करने का अधिकार है, उसी को एक निर्दोष व्यक्ति को न्याय देने में चार दशक लग गए – यह सिर्फ दुर्भाग्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय शर्म है।" इस मामले ने न्यायिक सुधार की आवश्यकता को फिर से उजागर किया है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम अपने सिस्टम की जवाबदेही तय करें?