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104 वर्षीय लखन लाल को 43 साल बाद मिली आजादी, न्यायपालिका पर उठे सवाल#crime
Ashok Pawar MD
(DELHI, NEW DELHI)
104 वर्षीय लखन लाल को 43 साल बाद मिली आजादी, न्यायपालिका पर उठे सवाल#crime
UP के प्रतापगढ़ जिले से दिनभर की बड़ी खबरें। 14/06/2026 #pratapgarh #latestnews @reporteJitendra
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शाहजहांपुर में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर "सेवा, संस्कार, सुशासन एवं सम्मान" थीम के तहत सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री Suresh Kumar Khanna तथा प्रभारी मंत्री Narendra Kashyap ने केंद्र और प्रदेश सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं एवं उपलब्धियों की जानकारी दी।
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केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने पर प्रभारी मंत्री ने गिनाईं उपलब्धियां शाहजहांपुर में आयोजित प्रेस वार्ता में उत्तर प्रदेश सरकार के प्रभारी मंत्री नरेंद्र कश्यप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने पर सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने जनधन, आयुष्मान भारत, पीएम किसान, उज्ज्वला, आवास, जल जीवन मिशन और डिजिटल गवर्नेंस जैसी योजनाओं को गरीबों, किसानों, महिलाओं और युवाओं के सशक्तिकरण का आधार बताया।
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Comments (1)
Ashok Pawar MD
03 Jun, 2025104-year-old Lakhan Lal got freedom after 43 years, questions raised on judiciary 104 वर्षीय लखन लाल, जिन्होंने ज़िंदगी के 43 साल एक अपराध के लिए जेल में बिताए जो उन्होंने कभी किया ही नहीं, अब अंततः निर्दोष घोषित कर दिए गए हैं। यह चौंकाने वाला मामला न केवल भारत की न्याय प्रणाली की धीमी प्रक्रिया को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि क्या वही न्यायपालिका, जो राष्ट्रपति के निर्णयों पर समयसीमा तय करती है, एक आम नागरिक को न्याय देने में इतने दशकों तक क्यों चूक गई? पूर्व जम्मू-कश्मीर पुलिस महानिदेशक शेष पाल वैद ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "एक 104 साल का व्यक्ति जिसने अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती 43 साल जेल में बिता दिए, आज़ाद तो हो गया लेकिन उस अन्याय का क्या? क्या कोई उसकी खोई हुई ज़िंदगी लौटा सकता है?" लखन लाल के मामले में यह स्पष्ट नहीं कि देरी का असली दोषी कौन है – पुलिस, अभियोजन पक्ष, या अदालतें। लेकिन इस मामले ने पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वैद ने आगे कहा, "जिस न्यायपालिका को राष्ट्रपति के निर्णयों की समयसीमा तय करने का अधिकार है, उसी को एक निर्दोष व्यक्ति को न्याय देने में चार दशक लग गए – यह सिर्फ दुर्भाग्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय शर्म है।" इस मामले ने न्यायिक सुधार की आवश्यकता को फिर से उजागर किया है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम अपने सिस्टम की जवाबदेही तय करें?